Best Blogger Tips

Banner

-
Showing posts with label लुंगी वाले गाँधीजी. Show all posts
Showing posts with label लुंगी वाले गाँधीजी. Show all posts

Oct 26, 2016

पापा..यहाँ आप की आहट है

पापा...... झक झक रौशनी की झिलमिल में आप की मुस्कराहट है
आप तो नहीं हैं साथ पर यहाँ आप की आहट है

मैं जीती हूँ हर दिन उस वक़्त को जो आप के साथ था 
कोई चिंता न थी हमें क्योंकि सर पे आपका हाथ था 
मैं पीती हूँ हर उस दर्द को आंसुओं के साथ, जब याद आते हैं वो दिन 
मैं ढूंढती हूँ आप को तस्वीरों में, कहानियों में, पुरानी चिट्ठियों में,
आप के कपड़ो में, किताबों में, ख्यालों में और सोच के पुलिंदों में.
दिवाली की झालरों में, रंगोली के रंगों में, देहरी के बसंतधारों में,
दीवालों पे लटकी माला में, आलों की सफेदी में, बताशों की ढेरी में.
खील में खिलौनों में, घर के हर एक कोने  में, मिठाई के दोने में, 
काकू की शाखों पर, मौसमी के पेड़ में, आँगन  की मेड़ में दीपक की कतारें हैं.
नज़ारे हर तरफ खुशनुमा, जगमगाहट ही जगमगाहट है.
दिया एक आपके भी नाम का अब  घर में जलता है 
रंगीन कागज़ की माला से आपका कोना सजता है 
ये सब यादें  मेरे ज़ेहन में आती और जाती  हैं 
पीले गेंदे की लड़ियाँ जब मंदिर को महकाती हैं।  
अज़ब दीपावली की गज़ब जगमगाहट है 
आप तो नहीं हैं साथ पर यहाँ आप की आहट है 

पापा ...... 
झक झक रौशनी की झिलमिल में आप की मुस्कराहट है
आप तो नहीं हैं साथ पर यहाँ आप की आहट है.

Contents of this blog / published on any of it’s pages is copyrighted and the sole property of the author of this blog and copying, disclosure, modification, distribution and / or publication of the content / photographs published on this blog without the prior written consent of the author is strictly prohibited.





Jan 21, 2015

"स्वामि डोसा"

दिल्ली  की भारी ठण्ड के चलते यह तय किया गया कि रात के खाने की आउटसोर्सिंग "स्वामि डोसा" से  की जाये। वो पचास रुपये में एक मसाला डोसा दे कर मेरी मध्यम वर्गीय जेब को हमेशा कृतार्थ करता है हालांकि मेरी महाकमीनी मध्यम वर्गीय सोच पचास रुपये में डोसे के साथ एक्स्ट्रा सांबर (ड्रमस्टिक वाला),लाल टमाटर की चटनी और खाने के लिए टेबल न होने पर हमेशा उसे लानतें  छोड़ती है पर ये भी सच है की सोच पर हमेशा जेब भारी पड़ जाती है और स्वामी डोसा की दुकानदारी सदाबहार चलती है।

उस दिन हमारे साथ साथ एक साऊथ  इंडियन अंकल जी भी पधारे जो अपनी पत्नी को एनिवर्सरी पार्टी के लिए लाये थे। आंटी गज़रे में जच रही थीं पर भारी ठण्ड से बचाव हेतु अंकल जी ने लुंगी के साथ कुछ कॉकटेल जैसा ड्रेस पहना था। सफ़ेद लुंगी के अंदर से काला गरम पैजामा बाहर झाँक रहा था और उसके नीचे स्लेटी गरम ऊनी मोज़े पैरो की शोभा बढ़ा रहे थे। प्लास्टिक की लैदर जैसा लुक देने वाली चप्पलें जिनमें मोज़े वाले  पैर लगातार ऐसे फिसल रहे थे कोई चेन से बधा कुत्ता शाम की सैर पर निकला हो, जो आजाद तो नहीं हो सकता पर लगातार दायें बायें भागता रहता है। लुंगी के ऊपर अमेरिका के झंडे वाला स्वेटर जो शायद उनका NRI बेटा छोड़ गया था और सर पे लाल बन्दरटोप (monkeycap) विराजमान था (नहीं उस पर अमेरिका का कोई निशान नहीं था ) और उस के बाहर मोटे फ्रेम का नज़र  का चश्मा। कुल मिला के इन कपड़ो में अंकल जी हड़प्पा मोहनजोदड़ो की सभ्यता का जीवंत प्रमाण लग रहे थे. मुझे समझ नहीं आया कि रोज़ इडली डोसा पकाने खाने के बाद भी ये पार्टी करने स्वामी डोसा क्यों  पधारे हैं। ख़ैर.…

डोसा कितने का ? वो रेट कार्ड को देखने के बाद भी शायद कुछ बार्गेनिंग के मूड में थे।  उसने बोर्ड की तरफ इशारा कर दिया। एक डोसा, सांबर चटनी एक्स्ट्रा डालने का ।  छोटू, सर का  डोसा ..... जल्दी। डोसा बनाते हुए अंकल जी छोटू को बोले - इतने गोल (घोल) में दो छोटी डोसा बनाओ और मसाला  भी  दो जगह डिवाइड करो. हम दो लोग है ना …  छोटू  ने  अपनी भैंगी आँखों से सर से पैरों तक उन्हें घूरा पर कपड़ों के अलावा उसे कुछ नज़र नहीं आया - वो  स्वामि की तरफ देख के चिंघाड़ा और हाथ हिला हिला के बोला - "येन्ना इन्ना वड़कम । एन्नार मलुका वड़कम " और मसाले का कटोरा वही फ़ेंक के एक ओर खड़ा हो गया।  स्वामी जो बाकि कस्टमरों की  भीड़ से घिरा नोट बटोरने में महाव्यस्त था, झुंझलाता हुआ आया और उससे पूछा की क्या हुआ।

अंकल जी ने वही बात स्वामि को कही जो उनके हिसाब से  पूरी तरह रीजनेबल थी ख़ास तौर पे तब, जब की वो कि वो दो दोसे का पूरा पचास रूपया देने को तैयार थे। स्वामी ने तमिल में कुछ कहा जो मैं दुर्भाग्यवश समझ न पायी और अब अंकल जी ने मुह के ऊपर से बन्दरटोप हटा लिया और  भाप के इंजन की तरह मुँह से धुंआ छोड़ते हुए अंग्रेजी में पचास के एक डोसे से पच्चीस पच्चीस के दो छोटे डोसे बनाने के इक्वेशन को एक्सप्लेन करने लगे। इस महागरिमामय वार्तालाप के बीच कस्टमरों की लाइन दुगनी हो गयी और कलेक्शन का काम ठप्प हो गया।  स्वामि कमर में हाथ रख के उनको कुछ समझा रहा था और वो लुंगी को आधा उठा के ऊपर कमर में खोंस चुके थे जो अब नी लेंथ स्कर्ट जैसा लुक दे रही थी हालाँकि गरम पैजामा उनकी शोभा बदस्तूर बढ़ा रहा था। इस व्यवधान से डोसे इडली की डेलिवरी बुरी तरह प्रभावित हुई और कुछ लोग जो अब तक धैर्य से खड़े थे अपनी अपनी गाड़ियों की तरफ जाने लगे. अंकल जी स्वामि  को तवे में चम्मच से छोटे छोटे दो डोसों का साइज समझा रहे थे।  छोटू एक तरफ खड़ा नाक में अंगुली डाले इस महामनोरंजक वार्तालाप का आनंद ले रहा था। स्वामी ने जोर जोर से "ना " में अपनी गर्दन हिलायी।  अंकल जी  ने पूरी उदारदिली दिखाते हुऐ कहा कि वो एक्स्ट्रा सांबर और चटनी के पांच रुपये और दे देंगे जिसे स्वामी ने सिरे से नकार दिया. इसी बीच एक अप्रेंटिस जो शायद बर्तन मांजने  के लिए लाया गया था बढ़ती  भीड़ और जाते हुऐ कस्टमरों के बीच अपनी डिजास्टर मैनजमेंट स्किल्स दिखाने के चक्कर में दूसरे तवे पर तीन डोसे फैलाने लगा और मसाला निकालने तक जले हुए डोसो की महक यज्ञ कुण्ड के धुऐं की तरह फैल गयी।  खड़े हुए लोग अब खांसने लगे थे। स्वामी का गुस्सा अब उफान पर था उसने वही से चिंघाड़ते  हुए करछी उठा के  इस डिजास्टर मैनजमेंट एक्सपर्ट के सर पे मारी  जो भगवान की कृपा से उसने कैच कर ली और स्वामि को तमिल में गाली देता हुआ एक तरफ भाग गया।  उसने जाते जाते स्वामी को देख के थूका भी जो शायद उसका काम से रेसिग्नेशन था।  छोटू ने ख़ुशी के मारे एक तीखी मुस्कान के साथ आँख मारी। अब अंकल जी भूख की वजह से और स्वामि अपने  नुकसान के कारण पूरे ताव में आ गए थे । अंकल जी जोर जोर से  तमिल में चिल्ला रहे थे मैं केवल रास्कला, ह्यूमन राइट्स और कंन्ज्यूमर कोर्ट ही समझ पायी। इस बीच आंटी जी जो उनके साथ बहुत देर से खड़ी थी उनको चक्कर आ गया  और वो बेहोश हो के गिर पड़ी।  अब तो स्वामि  का भगवान ही मालिक था।  स्वामि  ने आंटी को उठाया और लकड़ी  की बेंच पे लिटा दिया. अचानक पुलिस वैन की सीटियाँ बजने लगीं जो रात की पेट्रोलिंग पर थी।  स्वामि का चेहरा पहले काले से नीला और फिर धीरे धीरे कुछ  बैंगनी जैसे रंग का  हो गया।  

अंकल जी ने तुरंत छोटू को कुछ सूखी लाल मिर्चें तलने का आदेश दिया और भुनी हुई मिर्च आंटी जी को टोटके के तौर पे सुंघाई गयी।  मिर्च सुंघाते ही आंटी जी अपनी परम चैतन्यमयी अवस्था से बाहर निकल आई और अंकल जी ने गर्व मिश्रित भाव से चारो तरफ खड़ी जनता को देखते हुए कहा - दिस इस कॉल्ड अन्सिएंट नॉलेज। अबी डाक्टर पांच सौ रूपया ले लेता, चार टेस्ट करता और हफ्ते का दवाई बोल देता।  सब लूटने कोई बैठे इदर।  भीड़ देख के पुलिस ने गाड़ी रोक लिया … स्वामि हाथ जोड़ के अंकल से बोला "येन्ना इन्ना वड़कम । एन्नार मलुका एड़कम " मैंने मन ही मन इसका ट्रांसलेशन किया ( मुझे बचा लो अन्ना।  मेरे धंदे  पे लात न मारो।  चाहो तो मैं तुम्हें जिंदगी भर फ्री में दोसे खिलाऊंगा। तुम दूकान पे भी मत आना मैं फ्री होम डेलिवरी करूंगा। तुम कहोगे तो मैं एक दोसे के मसाले में चार डोसे बनाऊंगा।  ना  ना  बिलकुल नहीं। .पांच रुपये एक्स्ट्रा बिलकुल नहीं चाहिये।  दोसे के साथ मैं आंटी के लिए फ्री गिफ्ट में गज़रे भी दूंगा ) स्वामी बस अब रोने को ही था।

अंकल जी ने विजय भाव से उसे देखा और पुलिस वैन की तरफ मुड़कर बोले - अरे सर, सब ठीक है इदर। बुड्डा लोग है अबी हम।  ठण्ड बी तो कितना पडती है इदर , वाइफ का थोड़ा चक्खर आ गयी. पर ये है ना अपना स्वामी डोसा। … जेंटलमैन आदमी सर।  मानता  ही नई. बोलता है,आंटी को घर पे छोड़ेगा और डोसा भी घर पे दे के जाएगा। आफ्टरऑल अपना साउथ का आदमी। … वेरी होनेस्ट। .... आप आइए सर कभी इसका डोसा खाने।  वेरी टेस्टी विथ एक्स्ट्रा सांबर एंड चटनी। … स्वामी अपना सर खुजला रहा था पर उसके चेहरे का रंग वापस बैंगनी से काला हो गया था।  यद्यपि  छोटू ने अपनी नाक से अंगुली निकाल ली थी पर हमने डोसा नहीं खाया।  मेरे हिसाब से तो ये हैप्पी एंडिंग थी।आप का क्या ख्याल है ?

अपने कॉमेंट्स जरूर शेयर कीजियेगा और अगर ये ब्लॉग आपको अच्छा लगा तो आप इ मेल से सब्सक्राइब भी कर सकते हैं। 

Contents of this blog / published on any of it’s pages is copyrighted and the sole property of the author of this blog and copying, disclosure, modification, distribution and / or publication of the content published on this blog without the prior written consent of the author is strictly prohibited.




Sep 21, 2012

प्रोजेक्ट - सोसाइटी चेंजिकरण बनाम घर शिफ्टिंग ( पार्ट -2)

धारावाहिक उपन्यास 
(This post is not meant to hurt the sentiments of any particular community and is just a light hearted attempt to share my experience)
इस किस्त का पूरा मजा लेने के लिए पहले पार्ट -1 (साउथ इंडियन अंकल और लुंगी वाले गाँधीजी) पढें। 
बुड्ढे का फिलैट और धूप बत्ती 

अंकल जी ने घर के बीचों  बीच में  बनाये गए ड्राइंग  कम डाइनिंग रूम में खड़े हो के हमें उस घर की  लोकेशन के फाएदे गिनाने  शुरू किये। आगे की तरफ पड़ने वाली मार्केट और पीछे की तरफ पड़ने वाला हॉस्पिटल अंकल जी के हिसाब से उस घर का सबसे बड़ा यू एस पी था। उन्होंने हमें अपने साथ बिल्डिंग की छत पे चलने को कहा जहा से से इन यू एस पीज़ की एक्चुअल क्लोजनेस का वेरिफिकेशन किया जा सकता था। मार्केट  से भी ज्यादा वो इस बात पे जोर दे रहे थे कि  हम चाहें  तो घर की पिछली तरफ स्थित उस फाईव स्टार जैसे दिखते हॉस्पिटल का सुबह शाम चक्कर लगा सकते हैं। वो भी 5 मिनट से कम समय में। उनके हिसाब से ये एक बहुत बड़ी सुविधा थी। मुझे अचानक से झुरझुरी  होने लगी और पिछले महीने अपनी अक्लदाढ़ के माइनर ओपरेशन के वक़्त सर के उपर  जलता हुआ बड़ा सा हेलोजन बल्ब और मुह में मास्क लगाया हुआ डाक्टर याद आया। जो उस बल्ब की रौशनी में किसी यमराज से कम नहीं लग रहा था। मेरे माथे पे पसीने की बूंदे झलक आई और मैंने पति को लगभग खीचते  हुए छत से नीचे चलने का इशारा किया। अंकल जी बिना किसी कौमा , फुलस्टॉप के अपने कौनवरसेशन के तहत बिल्डिंग के नजदीक बने हुए कई सारे स्कूल दिखाने लगे पर फिर हमारे साथ कोई बच्चा न देख के उन्होंने इस पे ज्यादा फ़ोकस  नहीं मारा और ठीक बाजू वाले प्लाट पे उगे  बड़े से पीपल के पेड़ और उस के छन कर आती हवा को थोड़ी कम इम्पोर्टेंस का, पर एक और यू एस पी बताया। इस के बाद  पीपल से छन के आती हवा के स्वास्थ्य लाभ गिनाये गए। अपने मकान के इतने सारे फायदे गिनाते गिनाते अंकल जी रोमांच की चरम सीमा पर पहुँच गए और कांटीन्यूअस बोलने के कारण उनकी सांस उखड गयी। जहाँ पति के एक हाथ को में नीचे ले जाने के लिए खींच रही थी वहीं  दूसरे हाथ को अंकल जी ने सहारे के लिए पकड़ रखा था. " यु नो दिस पीफल पेयुरिफाइड विंड " वो चुप होने को तैयार नहीं थे और दम घुटने से उनकी मौत भी हो सकती थी। उनकी अंडे जैसे आँखें बाहर  निकल के गिरने को तैयार थी। एक बार को मुझे लगा पांच मिनट में  हॉस्पिटल पहुँचने वाले स्टेटमेंट की औथेंटीसिटी चेक करने का मौका आ गया था पर अंकल जी की हालत देख के मैने रवि को आवाज मारी। वो भागता हुए उपर आया और पति से बोला "सर जी जरा हाथ लगाना। कित्ती बार बोला है इनको की मेरा काम है मुझे करने दो। पर जे मानें तब न। अबी  कुछ हो हुआ जाता तो मेरी तो हो जाती न ऐसी तैसी। इनका क्या .. इनका भूत तो लटक लेता हेयीं इस पीपल पे और हुईं से ताकते रैता अपने फिलैट को। मेरी तो मार्किट रेपुटेशन ख़राब हो जाती ना ". मैंने महसूस  किया की दिलबहार की खुशबू का एफेक्ट थोडा कम हो गया था।

अंकल जी को पानी पिलाया और बाकि बातें फ़ोन पे करने का वादा करते हुए हम ने इज़ाज़त मांगी। अन्कल जी ने टूटती  उखड्ती साँसों के बीच जाते जाते और 15- 20 मिनट हमसे बातें की, जिसमें ये बताया  गया की वो उस ज़माने के इंजिनीअर हैं जब इंजिनीअर बनना उतना की कठिन था जितना की फिल्मो में हीरो बनना। और ये भी की चेन्नई के उनके पुश्तैनी घर का सारा इलेक्ट्रिफिकेशन उन्होंने उतनी सी उम्र मैं किया था जब बच्चे पैंट में पोट्टी करके धोना भी नहीं जानते। यु नो इंजिनीअर माँइंड। उन्होने अन्दर के दराज़ से निकाल के रजनीकान्त के साथ खिचवाया गया अपना फोटो भी दिखाया। उनका ये मानना था की उनमें और  रजनीकांत मैं काफी समानताएं थी। दोनों पर ही उम्र अपना असर नहीं दिखा पाई है। ये अलग बात है की रजनीकांत की किस्मत थोडा ज्यादा तेज़ निकली और वो हीरो बन के चमक गया। अदरवाइज़ टेलेंट की इनमें भी कोई कमी न थी। ये भी की कैसे उनके इंजिनियर माइंड ने बालकोनी मैं एक नल की यूटिलिटी को पहले ही समझ के उस एरिया में  टाइल्स लगवा दी थी ताकि दिवालो का पेंट न झडे और जाते जाते मेरा हाथ पकड़ के लगभग घिसटते हुए वो बाथरूम में  ले गए जहाँ  शावर के उपर बने एक छोटे से छेद को दिखाया जिसमें उनके हिसाब से एक गिट्टी ठोक के एक फैन फिट किया जाना था ताकि नहाते नहाते आप का शरीर सूखता भी रहे। ये उनके हिसाब से उनके इंजिनीअर माँइंड में आया आज तक का सबसे "झिनटैक" आइडिया था पर उन्होंने ये भी कहा की इस एक्स्क्लूसिव फैसिलिटी के एवज में वो रेंट में  कुछ एक्स्ट्रा ऐक्स्पैक्ट नहीं कर रहे थे। गिट्टी के लिए छोडे गए उस छेद को दिखाने के लिए उन्होंने अपने गले में लटकी एक सुतली में पिरोये गये  मिनी टॉर्च का इस्तेमाल किया जिसकी लाइट को जलाने के लिए उसे दो तीन बार हवा में जोर से झटकना पड़ता था। अंकल जी का ये टॉर्च भी उतना ही प्रागैतिहासिक लग रहा था जितना की अंकल जी खुद थे।

उनके चंगुल से छूटने की असफल कोशिश करते हुए हम दोनों ने आलमोस्ट भागने जैसी मुद्रा बना ली और पति तेज़ तेज़  चलते हुए अपने जूतो के पास पहुँच गए जो दरवाज़े पे खोले गए थे। अंकल जी टौर्च वाली सुतली को बंडी  के अन्दर डालते हुए जब तक हमारे पास पहुँचते हम आलमोस्ट लिफ्ट के अन्दर जा चुके थे। 0 का बटन दबाने और लिफ्ट के दरवाज़े बंद होने के बीच के समय में अंकल जी  ने पूरी ताकत लगा के जोर से कहा की नोन्वेज़ और पेट्स अलाउड नहीं हैं पर क्युकी हम अच्छे लोग हैं वो अंडे खाने की इज़ाज़त दे देंगे। और साथ ही यह भी की हमारे फ़ोन का इंतजार करेंगे। लिफ्ट के बंद होते दरवाज़े के बीच से जोर जोर से साथ हिलाते अंकल जी  नज़र आ रहे थे और और उनकी अंडे जैसे ऑंखें जिनमें हमने एक अच्छे किरायेदार को पाने की इच्छा को बलवती होते देखा था।

ग्राउंड फ्लोर पे आते ही रवि ने एक बार फिर "ख्वाक्क" की उस विलक्षण आवाज़ के साथ बचे खुचे दिलबहार फ्लेवर्ड थूक को गार्डेन एरिया में विसर्जित किया और सर खुजाता हुआ बुदबुदाया " ऐसे तो लग गया बुढ़ढ़े  का   मकान किराये पे, बस धुप बत्ती करते करते ही मर जागा ये तो ". मैंने और पति ने एक दुसरे का मुहं  देखा और इस मिस्वेंचर पे मुस्कुरा दिए। "चलो सर जी मैं बताता हूं आपको फिर फ़ोन पे। एक दो और भी हैं फ्लैट"
वो समझ चुका था हमारे दिमाग में क्या चल रहा था।


धारावाहिक उपन्यास प्रोजेक्ट - सोसाएटी चेंजिकरण  बनाम "घर शिफ्टिंग" की आगे की किस्तों में बाकि घटनाओ को समेटने को कोशिश रहेगी . बने रहिएगा और अपने कमेंट्स जरूर शेयर करें।

शुभ रात्रि 
Kaivi

Contents of this blog / published on any of it’s pages is copyrighted and the sole property of the author of this blog and copying, disclosure, modification, distribution and / or publication of the content published on this blog without the prior written consent of the author is strictly prohibited.

Happy New Year