धारावाहिक उपन्यास
(This
post is not meant to hurt the sentiments of any
particular community and is just a light hearted attempt to share my
experience)
साउथ इंडियन अंकल जी और लुंगी वाले गाँधीजी
अभी तक मैं उस मनहूस दिन के सदमे से उबरने की नाकाम कोशिश मैं लगी हूँ जब दिन की शुरुआत हमारी सोसाएटी की मैनेजमेंट कमेटी द्वारा भेजी गए एक ताज़ा तरीन चिठ्ठी से हुई जिसमें लिखा गया था की हमारे फ्लैट की एक छोटी बालकोनी को तोड़ के बड़ा किया जाएगा और ये "छोटा सा" प्रोजेक्ट बस दो साल तक चलेगा। मैं और पति और हमारी लाइफ जो इस फ्लैट में छह साल बिताने के बाद लगभग ऑटो पाईलट मोड में आ चुकी थी अचानक ऐसे हिलने लगी जैसे जेट एयरवेज़ की शौर्ट डिसटेंस "एयर बस " एक ऊँचाई पे आने के बाद अचानक टरबुलेंस करने लगी हो। खैर आपसी सहमति और यार दोस्तों के साथ परामर्श से यह तय हुआ की चूंकि ये "छोटा सा" प्रोजेक्ट दो साल चलने वाला है हमें घर बदल लेना चाहिए और इसके लिए कुछ एक दोस्तों ने कुछ एक प्रोपर्टी एजेंट्स के नाम पते भी बताये। मेरा मानना था की ये मुफ्त सलाह इस तर्ज़ पे दी गयी है की बेटा "हम ने भुगत लिए अब तू भी भुगत". दुर्भाग्यवश पति को यह सुझाव जंच गया जबकि मेरे मन ही मन हाथ पाँव फूलने लगे। बिलकुल वैसे ही जैसे सालो पहले एक बार मारीशस की यात्रा के दौरान समुद्र के उपर से उड़ते समय जहाज मैं आये टरबुलेंस के वक़्त हुआ था। पेट मैं अजीब अजीब से गोले जैसे बन रहे थे। और साथ बैठे हुए लोगो के "व्हाट अ व्हियु" "व्हाट अ व्हियु" (what a view) जैसे शब्द भददी गालियों जैसे सुनाई दे रहे थे। यहाँ जान पे बनी हुए है और ये साले इस मौत के तांडव के तस्वीरीकरण में लगे हुए हैं। डर के मारे मैंने आँखें बंद कर ली तो बंद आँखों के अन्दर मुझे अपना ब्रांडेड टॉप जो मॉरीशस की शौपिंग के दौरान शौपर्स स्टॉप से खरीदा था एक शार्क के आरी जैसे दांतों के बीच फंसा हुआ दिखाई दिया, अलबत्ता बॉडी का कहीं अतापता नहीं था। मैंने डर के मारे ऑंखें खोल ली और भगवन कसम उस हालत मैं भी मुझे 1 सेकेण्ड के लिए 1500 का टॉप खरीदने का अफ़सोस हो गया। सारे पैसे बरबाद। कहा था मैंने पति से की वर्थ नहीं हैं। और धीरे से फुसफुसा के ये भी कहा था की मुझे पूरा शक है की ये लोग सरोजिनी नगर के "उठा लो !! उठा लो " वाले मॉल को ही यहाँ अपना स्टिक्कर लगा के बेचते हैं .. पर मेरी कौन सुने। अब भुगतो .. गए 1500 शार्क के मुह मैं।
खैर मेरे पेट मैं गोलों का उठना जारी था अलबत्ता पति ने कुछ ही दिन पहले अख़बार के साथ आई पीले रंग की "यलो पेजेज़" खोल के प्रोपर्टी एजेन्ट्स के नंबर तलाशना शुरू कर दिया था। ये पीली किताबें यदाकदा हमारे घर अखबार के अन्दर ढकी छुपी आया करती हैं । और जमीन से अख़बार उठाते ही किनारे से जरा सा झांक के अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं। मुझे इन्हें देख के हमेशा ऐसे विचार आते हैं जैसे कोई नए नवेली छोटी सी दुल्हन अपने चटक रंग के लिबास मैं पति के साथ घर मैं पहली बार एंट्री कर रही हो और उसके भारी भरकम पुरुषत्व टपकाते डीलडौल के पीछे एक अपार सुरक्षा की भावना से अभिभूत अपने होने का संकेत दे रही हो। बेहरहाल पति ने इन्हीं पीली किताबो से कुछ एक नंबर निकाले और उन्हें अपने " सोसाईटी चेंजिकरण " अभियान के बारे में अवगत कराया। मुझे रसोई में खड़े खड़े फ़ोन के उस पार प्रोपर्टी एजेंट का लार टपकाता चेहरा दिखाई दिया जैसे कह रहा हो " आ जा बेटा , आ जा, तेरा खून न चूस लिया तो मैं अपनी जात का नहीं ". इस कल्पना की विहंगमता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है की मैं अपने दोनों कानो को हाथो से बंद करके आसमान की ओर देखते हुए "नहीं हीं हीं हीं हीं हीं हीं हीं हीं" कहने ही वाली थी की पति गर्व मिश्रित भाव से मेरे पास आ के बोले दो फ्लैट हैं , शाम को दिखाने को बोल रहा है . तुम तैयार रहना। आज तक मैंने प्रोपर्टी अजेंट्स के द्वारा लोगो का मानसिक विक्शिप्तिकरण होते सुना था पर आज तो अपनी और पति की खैर मनाने के सिवाय कोई चारा न दिख रहा था।
मैंने पति को एक बार फिर सोच लेने का सुजाव दिया जो आमने सामने के खिडकियों में होने वाले क्रौस वेंटिलेशन की तरह मेरी तरफ से आया और सामने वाले की तरफ से निकल गया। मैंने पीछे की बालकोनी से दिखने वाले हरे भरे गार्डेन वियू की भी दुहाई दी पर पति ने इसे इस साल की बरसात का साइड एफ्फेक्ट बताते हुए खारिज कर दिया। पति सीटी बजाते हुए नहाने चल दिए और पीछे से उनका लगातार बजता हुआ ब्लैक बेरी प्रोपर्टी अजेंट्स के द्वारा किये जाने वाले हमारे मानसिक बलात्कार का बिगुल बजाता रहा .... हर हर महादेव ..
पहला दिन :
आज का दिन "रवि ब्रोकर" के नाम था. मेरे इस अविस्मरणीय अनुभव यात्रा मैं जिस ब्रोकर ने मुझे थोडा सा भी इम्प्रेस किया था वो रवि ही था। क्यूकर वो अपने यूपी / उत्तराँचल में आम घूमने वाले लडको (माथे पे हनुमान जी का सिन्दूरी टीका लगाये ) जैसा दीखता और खासतौर पर बोलता भी था। धृतराष्ट्र के दरबार जैसे इस ब्रोकरों के नेटवर्क मैं मुझे अपनी और पति की स्थिति द्रौपदी जैसी लग रही थी। कब कौन दुशासन साडी खीच लेगा पता न था और खासतौर पे इस हालत मैं जहा हम घर से भगा दिए गए मरियल कुत्ते की तरह सडको की खाक छानने का निर्णय कर चुके थे, नए आसरे की तलाश तक हम हर किसी पे यकीन नहीं कर सकते थे . खास तौर पे किसी हार्डकोर पंजाबी ब्रोकर पे तो बिलकुल भी नहीं। मेरा ये पूर्ण विश्वास था की ये लोग " हाँ जी , हूँ जी " करके बड़ी सफाई से चू ...... बना देते हैं। हालाकि ये बात किसी पर भी लागू हो सकती है पर अपने कैरियर की शुरुवात में दिल्ली वाली मौसी के घर पे रहते हुए मौसाजी के सुनाये हुए अनंत किस्सों ने मेरे इस विश्वास को पुख्ता करने मैं मदद की थी की मैं पंजाबियों के साथ समहल के रहूँ । ये अलग बात है की मेरे जीवन मैं आये ज्यादातर पंजाबी महात्मनो ने इस विश्वास को ठेस ही पहुंचाई पर कुछ एक ने अपने सद्कर्मो से और " हाँ जी , हूँ जी " के चतुर बाणों से ऐसा मेरा ऐसा बैंड बजाया की मौसाजी की बात का गूढ मतलब समझ मैं आ गया। खैर रवि "हाँ जी , हूँ जी "से दूर एक यूपी वाला लड़का था इस लिए मैंने उससे "बेनिफिट ऑफ़ डाउट" दे दिया और उस के साथ हम पहले फ्लैट का निरीक्षण करने चल पड़े। ये फ्लैट एक रिटायर्ड "साउथ इंडियन अंकल जी" का था " जो रवि के पास एक्सक्लुसिव क्लाएंट की तरह पड़ा हुआ था। ये अंकल जी जनकपुरी में एक डी डी ए के सरकारी मकान में रहते थे और द्वारिका के अपने इस फ्लैट को एच डी ऍफ़ सी के पेंशन प्लान की तरह यूज़ करते थे. ये फ्लैट भी पूरी स्वामी भक्ति निभाते हुए हर साल महंगाई के हिसाब से पेंशन की रकम में बढोत्तरी करता जाता था . रास्ते भर रवि हमें अंकल जी की सद्नीयती के महान किस्से सुनाता रहा और एक क्षण ऐसा भी आया जब की ये अनदेखे अंकल जी मुझे गाँधी जी सद्रश लगने लगे। अंकल जी के साथ ही साथ उनके घर की तारीफ के भी जम के कसीदे काढ़े गए और रास्ता ख़त्म होने तक मेरा सीना गर्व से फूल कर दो गुना हो गया कि अंकल जी जैसे महान आत्मा का घर हमें दिखाया जा रहा है। न सिर्फ दिखाया जा रहा है बल्कि हाथ के हाथ डील फ़ाइनल करने की गारेंटी भी दी जा रहे है। अचानक से रवि मुझे मुन्नाभाई ऍम बी बी एस का मुन्ना जैसा लगने लगा जो गुंडा तो था पर दिल का बहुत अच्छा था और अंकल जी का घर बापू का साबरमती आश्रम जहाँ मुझे और पति को प्रोपर्टी मार्केट के दुशासनो द्वारा किया जाने वाले मानसिक बलात्कार से निजात मिल सकती थी। मैंने गोल फ्रेम का चश्मा और लुंगी पहले अंकल जी का मन ही मन सम्मान किया और उनकी काल्पनिक छवि से कुछ बातें भी की। (नोट: यहाँ मैंने अपनी कल्पना मैं गाँधी जी की धोती को बिना ज्यादा सोचे लुंगी मैं परिवर्तित कर दिया क्युकी अंकल जी साऊथ इंडियन थे )
" आएये सर। ये वाली सोसाइटी है। बिल्कल मार्केट के अपोजिट" . लोकेशन देखिये आप .. रवि ने पति के बगल मैं खड़े होते हुए गुटके के खाली पैकेट को रोड में उछाल दिया और "ख्वाक " की विलक्षण आवाज के साथ पैकेट के अन्दर के सामान को सही तरह से प्लेस करने के लिए मुह के एग्जिस्टिंग थूक को पूरे निशाने के साथ नाली में विसर्जित किया। पैकेट का सामान मुह के अन्दर जीभ की सहायता से तीन जगहों पे प्लेस किया गया . दोनों गालो के साइड में और बाकी नीचे वाले होंठ के अन्दर। एक दो बचे खुचे तम्बाकू के टुकडे जो कहीं भी अड्जेस्ट होने को तैयार नहीं थे बड़ी सफाई के साथ दोनों होठो और उसके बीच में जीभ रखकर, और फिर अन्दर से हवा बाहर फेकते हुए "अथथथथू " की आवाज़ के साथ रफा दफा किये गये । अपनी नीचे खिसक आयी पेंट को उपर खीचते हुए उसने गार्ड से कहा " 403 दिखाना है " इस महाखुशबूदार मिश्रण को खाने के बाद बोले गए उसके पहले वाक्य के साथ ही उसके मुह से आने वाली हर बात "दिलबहार गुटके" की तीखी महक से लबरेज़ थी और उसके आस पास के चार चार फिट के एरिया को ऐसा खुशबूदार बना रखा था की उसके सामने पति की विल्स की इम्पोर्टेड परफ्यूम दम तोडती नज़र आई।
मैं और पति रवि के पीछे पीछे सोसाइटी में दाखिल हुए। कॉमन एरिया को देखने से ऐसा लगा जैसे ये किसी छोटे शहर के स्कूल का हॉस्टल हो। जहां एक छह मंजिला बिल्डिंग के लम्बे लम्बे गलियारों में एक के बगल में एक कमरे बना दिए गए हों और सब का मेन डोर एक ही गलियारे मैं खुलता था। वहाँ की सुनसानी देख के ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे एक बैच पास हो के जा चुका है और अगला आने के पहले उस बाबा आदम के ज़माने की बिल्डिंग के जीर्णओधार की असफल कोशिश की जा रहे है । बिल्डिंग के पिछले वाले हिस्से से जाते हुए मुझे "हॉरर नाइट्स " के कुछ एपिसोड भी याद पर गाँधी जी जैसे लैंडलौर्ड के आगे इस सब को अनदेखा किया जा सकता था। अंकल जी की काल्पनिक छवि को मन मैं सम्हाले लिफ्ट में चढ़ गयी। रवि ने बताया की "क्या चांस की बात है सर जी , अंकल जी भी अभी आये हुए हैं. देख लो किस्मत " रवि ने लिफ्ट की दीवाल पे पीक उछालते हुए कहा। "जब संजोग होता है तो सब कुछ अपने आप हो जाता है ". हम लिफ्ट से बाहर निकले और रवि ने 403 की तरफ का डाएरैकशन संकेत से बताया। बोल के वो अपनी पीक को वेस्ट नहीं करना चाहता था शायद। हम आगे बढ़ चले।
रवि ने बेल बजाई। एक बार , दो बार , तीन बार , बार बार बार बार और 5 मिनट तक इंतजार करने के बाद झल्लाता हुआ उनका मोबाईल ट्राई करने लगा। मेरे कानो मैं कुछ शब्द पड़े जो मुह की पीक की वजह से बहुत साफ नहीं थे पर कुछ यूँ था " कित्ती बार समझाया है अंकल जी को पाट्टी (पार्टी) से मिलने मशीन (hearing aid )लगा के आया करो"
आंखिर इंतजार के बाद लकड़ी का दरवाज़ा खुला और एक जोड़ी सफ़ेद अंडे जैसे आंखें जाली के दरवाजे से बाहर झाँकती हुई नज़र आई। रवि ने तुरंत नकली मुस्कुराहट बिखेरते हुए अंकल जी को नमस्ते किया। पति जाली के अन्दर अंडे जैसे आँखों के आस पास चेहरे के होने ही संभावनाओ को तलाशते नज़र आये, जबकि मैं गाँधी जी के चहरे को ढूंढती नज़र आई। रवि के नमस्ते को कोई तवज्जो ने देते हुए उन आँखों ने जाली के अन्दर से ही हमारा सरसरी मुआयना किया और हाथ से जूते बाहर उतरने का संकेत करते हुए दरवाजा खोल दिया। "जूथा बाहर प्लीज़ । हम ब्रह्मिन लोग है " और करीब तार तार हो चुकी नीले रंग की हाफ शर्ट के उपर के टूटे हुए बटन के अन्दर से झांकती तिरछी पॉकेट वाली बंडी के अन्दर से अपनी जनेऊ निकाल के दिखाई। मुझे खादी की बंडी देख के एक बार फिर गाँधी जी की याद आई पर उनकी किसी भी फोटो में मैंने उन्हें जनेऊ पहने हुए नहीं देखा था। उस वाली मैं भी नहीं जो "अल्मोडा में पढने के दौरान हमारे बड़े से प्रार्थना स्थल के सामने लगी हुई थी। उस से बड़ा गाँधी जी का क्लोज़ अप फोटो मैंने आज तक नहीं देखा था " मैंने एक बार फिर उस फोटो को ध्यान से याद किया की शायद उस मैं गांधीजी ने जनेऊ पहनी हो। पर दिमाग में लाख जोर डालने का बाद भी मुझे जनेऊ नहीं दिखाई दी। खैर ये तो कोई बात न हुई की अंकल जी गाँधी जी जैसे महान न हों । क्या पता गाँधी जी ही फोटो खिचवाने से पहले जनेऊ उतार लेते हो। एक बार को गाँधी जी पे डाउट करा जा सकता था पर अंकल पे डाउट करना .. छि छि छि .
अंकल जी ने इस बात पे आश्वस्त हो जाने के बाद की हम ठीक ठाक लोग हैं (लफाड़े टाइप नहीं ) हम पे रहम खाया और अपने पिचके हुए गालो के बीच कसमसाते हुए होटो को मुस्कुराने के अंदाज़ में फैलाया। वो कुछ कुछ हंसी जैसी थी पर मैं पक्का नहीं कह सकती थी की वो हंसी ही थी या कुछ और। अपनी स्वाभाविक आदतानुसार मैं अंकल जी के ओबज़रवेशन मैं व्यस्त थी जबकी पति घर का जाएजा ले रहे थे। अंकल का घर नया नया रंगा पोता गया था और फर्श को घिस घिस के चमकाया गया था। कुल मिला के बिल्डिंग की बाहरी हालत के हिसाब से घर के अन्दर की हालत काफी अच्छी थी। हम अपना मुह खोलते उससे पहले अंकल ने रवि को दूर खड़े रहने का इशारा किया और हमें लगभग खीचते हुए किचन की तरफ ले गए। छह बाई आठ का किचन हरे ग्रेनाइट की स्लैब और पीले रंग के माइका के वुडवर्क से सजाया गया था। इस तरह का "झिनटैक" कलर कॉम्बिनेशन देख के मुझे गजनी में आमिर खान के रोमांटिक गानों का चटकीला ड्रेसिंग सेंस याद् आ गया। खैर फ्लैट के निरीक्षण में वापस कंसेंट्रेट करते हुए मैंने नोटिस किया कि किचन के बीचो बीच दीवाल में एक दो बाई दो का ग्रेनाइट का टुकड़ा फिट किया गया था जिस पे किसी भगवान् की फोटो को दीवाल से टिका के खड़ा किया गया था और सामने दो अगरबत्तिया जल रही थी। मेरी साउथ इंडियन भगवानों की लिमिटेड जानकारी के साथ मन ही मन मैंने उन भगवान का नामकरण "मुत्तुस्वामी" कर दिया. अंकल ने हमें मुत्तुस्वामी भगवान के सामने सर झुकाने का इशारा किया। अब बापू के आदेश को कौन टाल सकता था . हम ने मुत्तुस्वामी भगवान के आगे हाथ जोड़े और अंकल ने भगवान् की फोटो के सामने रखी डिब्बी मैं से थोड़ी थोड़ी राख निकाल के हमारे भवो के बीच और नाक के जोड़ के स्थान पर लगा दी। अब अंकल फ्लैट दिखाने की प्रक्रिया के लिए पूर्ण रूप से तैयार थे। प्रक्रिया को शुरूआत उन्होंने एक पहेली से की। " कैन यू टेल मी ,किचन के बीचो बीच ये काला पत्थर क्यों लगवायी है?" पति ने उनके पूजा प्रेमी स्वाभाव को भांपते हुए उत्तर दिया " इट मस्ट बी फॉर द मंदिर " अंकल ने हिकारत भरी नजरो से पति को देखा मानो कह रहे हों "साले ने ग्रेनाइट लगवाने के सारे एडवेंचर का मजा ख़राब कर दिया" उम्मीद भरी नजरो से उन्होंने मेरी आँखों में देखा जो अब भी उनमें बापू को तलाशने की नाकाम कोशिश कर रहे थी। "आई थिंक इट्स फॉर द माइक्रोवेव। मैंने जवाब दिया। अंकल ऐसे उछले जैसे मैंने हॉट सीट पे बैठ के कौन बनेगा करोरपति में एक करोड़ के सवाल का सही जवाब दे दिया हो और अब वो एक करोड़ का चेक मेरे नाम लिखने जा रहे हो। " यू आर राईट। यू नो . आइ हैड अ फाइट विद माय वाइफ हू वाज़ टेलिंग नोट टू फिक्स दिस ग्रेनाइट हियर। बट आइ आलवेज़ न्यू द यूटिलिटी। यू नो एन एन्ज़िनिअर माइंड। मेरे दिमाग में बैठे गांधीजी की रही सही छवि इस एन्ज़िनिअर माइंड ने छनाक से तोड़ दी और जो बचा वो था "एक पिचके गाल और अंडे जैसे आँखों वाला एन्ज़िनिअर माइंड जो गाँधी जी से भी ज्यादा प्रागैतिहासिक (रादर एंटीक ) दीखता था। रवि किसी सजायाफ्ता मुजरिम की तरह दरवाजे पर खड़ा था और अंकल जी घर दिखाने का उसका रोल बखूबी निभा रहे थे। अंकल जी ने मेरे साथ किचन से बाहर आते आते उस पर एक नज़र डाली और दिलबहार की खुशबू फैलाने के लिए लानत छोड़ी। अंकल जी ने जिस हिकारत भरी नजरों से उसे देखा था मुझे एकबानगी ऐसा लगा जैसे अंकल जी अब उसे मुर्गा बना देंगे पर उसकी किस्मत शायद उस दिन कुछ अच्छी थी की अंकल जी के एन्ज़िनिअर माइंड में ये आईडिया नहीं आया।
आगे जारी है..
आज यहीं पर ख़त्म करती हूँ . और बहुत कुछ है आप सब को सुनाने को इसलिए धारावाहिक उपन्यास प्रोजेक्ट - सोसाएटी चेंजिकरण बनाम "घर शिफ्टिंग" आगे की किस्तों में जारी रहेगा। बने रहें और अपने कॉमेंट्स जरूर शेयर करैं।
शुभ रात्रि
Kaivi
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